(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.226. अध्यायः 226
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
परमेश्वरेण पार्वतींप्रति प्राणिनां स्त्रीत्वपुंस्त्वयोः स्वाभाविकत्वनिषेधेन कर्मायत्तत्वोक्तिः॥ 1 ॥ तथा सात्विकादिधर्मादिप्रतिपादनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

उमोवाच।

देवदेव महादेव श्रुतं मे भगवन्निदम्।
आत्मनो जातिसम्बन्धं ब्रूहि स्त्रीपुरुषान्तरम्॥ 13-226-1(90274)
स्त्रीप्राणाः पुरुषप्राणा एकतः पृथगेव वा।
एष मे संशयो देव तं मे छेत्तुं त्वमर्हसि॥ 13-226-2(90275)
महेश्वर उवाच। 13-226-3x(7592)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता।
स्त्रीत्वं पुंस्त्वमिति प्राणे स्थितिर्नास्ति शुभेक्षणे॥ 13-226-3(90276)
निर्विकारः सदैवात्मा स्त्रीत्वं पुंस्त्वं न चात्मनि।
कर्मप्रकारेण तथा जात्यां जात्यां प्रजायते॥ 13-226-4(90277)
कृत्वा कर्म पुमान्स्त्री वा स्त्री पुमानपि जायते।
स्त्रीभावं यत्पुमान्कृत्वा कर्मणा प्रमदा भवेत्॥ 13-226-5(90278)
उमोवाच। 13-226-6x(7593)
भगवन्सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत्।
कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ 13-226-6(90279)
महेश्वर उवाच। 13-226-7x(7594)
शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत्।
प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः॥ 13-226-7(90280)
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः।
व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः॥ 13-226-8(90281)
सत्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः।
प्रकाशात्मकमेतेषां सत्वं सततमिष्यते॥ 13-226-9(90282)
रजो दुःखत्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम्।
त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते॥ 13-226-10(90283)
सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः।
एवमादि तथाऽन्यश्च कर्म सात्विकमुच्यते॥ 13-226-11(90284)
दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति।
कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता।
रजसश्चोद्भवं चैतत्कर्म नानाविधं सदा॥ 13-226-12(90285)
अनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृशम्।
हिंसाऽसत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च।
तमसश्चोद्भवं चैतत्कर्म पापयुतं तथा॥ 13-226-13(90286)
तस्माद्गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः।
तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ 13-226-14(90287)
सात्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे।
तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः॥ 13-226-15(90288)
उमोवाच। 13-226-16x(7595)
किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन्देहे शस्त्रेण वा हते।
स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-226-16(90289)
महेश्वर उवाच। 13-226-17x(7596)
तदहं ते प्रक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम्।
एतन्निर्णायकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः॥ 13-226-17(90290)
कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम्।
उपद्रवो भवेद्देहे येन केनापि हेतुना॥ 13-226-18(90291)
तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम्।
अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः॥ 13-226-19(90292)
देहक्षयेपि नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते।
तिष्ठेत्कर्मफलं यावद्व्रजेत्कर्मक्षये पुनः॥ 13-226-20(90293)
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता।
एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ॥ 13-226-21(90294)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 226 ॥


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